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Friday, 12 January 2018

षट्तिला एकादशी की व्रत कथा (Shattatila Ekadashi ki vrat katha)

Vishnu bhagwan
।। ॐ नमो भगवते् वासुदेवाय् ।।
हिंदू मान्यता के अनुसार षट्तिला एकादशी का व्रत अत्यधिक महत्वपूर्ण होता इस व्रत को करने से बैकुंठ में स्वर्ग प्राप्त होता है। शास्त्रों में पुराणों के अनुसार वर्ष में 24 एकादशी होती हैं 24 एकादशियों में से जो माघ के महीने में कृष्ण पक्ष में आती है उसे षट्तिला एकादशी कहते हैं। मान्यता के अनुसार माघ का महीना अत्यधिक पुण्यदायी होता है। इस बार षट्तिला एकादशी 12 जनवरी 2018, शुक्रवार को है। षट्तिला एकादशी के व्रत में तिल से बनी वस्तुओं का प्रयोग अत्यधिक प्रकार से करने पर व एकादशी का नियमानुसार व्रत करने से विष्णु भगवान अत्यधिक प्रसन्न होते हैं और शुभ फल देते हैं।
Vishnu bhagwan
षट्तिला एकादशी व्रत करने की विधि (Shattatila Ekadashi vrat karnr ki Vidhi)
मान्यता के अनुसार माघ महीना अत्यधिक पवित्र और पावन माना जाता है। एकादशी का व्रत हर व्यक्ति को विधि विधान पूर्वक करना चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले वर्ति को सुबह-सुबह स्नान करके विष्णु भगवान की प्रतिमा के सामने धूप दीप वह पुष्प अर्पण करना चाहिए और इसके साथ उड़द की दाल और तिल से मिश्रित खिचड़ी का भोग विष्णु भगवान को लगाना चाहिए इसके साथ विष्णु भगवान विष्णु भगवान का मंत्र 'ओम नमो भगवते्  वासुदेवाय्' का जाप 108 बार करना चाहिए। षट्तिला एकादशी के व्रत में तिल से बनी वस्तुओं का अत्यधिक प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार विष्णु भगवान की विधि विधान से पूजन अर्चना करने से षट्तिला एकादशी का व्रत संपन्न होता है।
Vishnu bhagwan
षट्तिला एकादशी की व्रत कथा (Shattatila Ekadashi ki vrat katha)
पद्म पुराण में भगवान व‌िष्‍णु ने नारद मुन‌ि से बताया है क‌ि 
षट्त‌िला एकादशी अन्न धन और सुख देने वाली है। इस एकादशी के संदर्भ में पुराणो के अनुसार जो कथा म‌िलती है उसके अनुसार एक स्‍त्री भगवान व‌िष्‍णु में बड़ी  भक्त थी और सभी व्रत रखती थी ज‌िससे उसका शरीर तो शुद्ध हो गया था लेक‌िन कभी अन्न दान नहीं देने के कारण मृत्यु के बाद वह बैकुंठ में तो पहुंच गई लेक‌िन उसे खाली कुट‌िया म‌िली।

स्‍त्री ने भगवान से पूछा क‌ि प्रभु बैकुंठ में आकर भी मुझे 

खाली कुट‌िया क्यों म‌िली है तब भगवान व‌िष्‍णु ने बताया क‌ि तुमने कभी कुछ दान नहीं क‌िया और जब मैं तुम्हारे उद्धार के ल‌िए दान मांगने तुम्हारे पास आया तो तुमने मुझे म‌िट्टी का एक ढेला पकड़ा द‌िया ज‌िससे तुम्हे यह फल म‌िला है। अब इस समस्या का एक मात्र उपाय है क‌ि तुम व‌िध‌ि पूर्वक षट्त‌िला एकादशी का व्रत करो। इस व्रत से म‌ह‌िला की कुट‌िया अन्न धन से भर गई।

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- विष्णु भगवान के 108 नाम
- विष्णु भगवान की आरती
- विष्णु भगवान की चालीसा
- विष्णु भगवान की व्रत कथा
- विष्णु भगवान के मंत्र



Thursday, 28 December 2017

विष्णु भगवान के मंत्र (Vishnu bhagwan ke mantra)

Vishnu bhagwan
।। ॐ नमो भगवते् वासुदेवाय ।।
हिंदू मान्यता के अनुसार विष्णु भगवान त्रिदेवों में से एक हैं। विष्णु जी को सृष्टि का संचालक कहा जाता हैं। विष्णु की पत्नी लक्ष्मी है। विष्णु जी क्षीर सागर में विराजमान रहते हैं। यह अपने भक्तों पर विशेष कृपा दृष्टि बनाए रखते है और उन्हें शुभ फल प्रदान करते हैं। इन मंत्रों द्वारा विष्णु जी जल्द प्रसन्न हो जाते हैं।
विष्णु भगवान के मंत्र 
                                                                                                
भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए।

ॐ नमोः नारायणाय. ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ||

                                                                                                
दरिद्रता से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु के इस मंत्र का जाप करना चाहिए।

ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।
ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।

                                                                                                
घर में सुख-संपत्ति लाने के लिए विष्णु जी के इस मंत्र का जाप करना चाहिए।
शांता कारम भुजङ्ग शयनम पद्म नाभं सुरेशम।
विश्वधारंगनसदृशम्मेघवर्णं शुभांगम।
लक्ष्मी कान्तं कमल नयनम योगिभिर्ध्याननगमयम।
वन्दे विष्णुम्भवभयहरं सर्व्वलोकैकनाथम।।

                                                                                                
अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान विष्णु को इस मंत्र द्वारा प्रसन्न करना चाहिए।
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।
हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।

ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान।
यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्टं च लभ्यते।।

                                                                                                
घर की परेशानी को दूर करने और खुशी के लिए विष्णु जी के इन मंत्रों का जाप करना चाहिए।
ऊँ नारायणाय विद्महे।
वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव,
त्वमेव विद्या, द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वं ममः देवदेवा।।

                                                                                                

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Wednesday, 27 December 2017

श्री विष्णु चालीसा (shri Vishnu chalisa)

Vishnu bhagwan
।। ॐ नमो भगवते् वासुदेवाय नमः ।।
हिन्दू मान्यता के अनुसार विष्णु भगवान हिंदू धर्म के देवता हैं। विष्णु जी त्रिदेवों में से एक बताए गए हैं। कहा जाता है कि विष्णु भगवान की व्रत कथा के बाद विष्णु भगवान की चालीसा और आरती को पढ़ना या सुनना चाहिए। मान्यतानुसार जगत का पालन श्री हरि विष्णु जी ही करते हैं। भगवान विष्णु को दया-प्रेम का सागर माना जाता है।  विष्णु जी देवी लक्ष्मी (विष्णुजी की पत्नी) के साथ क्षीरसागर में वास करते हैं। सच्चे मन से आराधना करने पर वह व्यक्ति की सारी इच्छाएं पूर्ण करते हैं।  

श्री विष्णु चालीसा (shri Vishnu chalisa)

॥ दोहा ॥
जै जै श्री जगत पति जगदाधार अनन्त । 
विश्वेश्वर अखिलेश अज सर्वेश्वर भगवन्त ॥

॥ चौपाई ॥
जै जै धरणीधर श्रुति सागर । जयति गदाधर सद्गुण आगर ॥
श्री वसुदेव देवकी नंदन । वासुदेव नाशन भव फन्दन ॥1॥
नमो नमो सचराचर स्वामी । परंब्रह्म प्रभु नमो नमो नमामि ॥
नमो नमो त्रिभुवन पति ईश । कमलापति केशव योगीश ॥2॥

गरुड़ध्वज अज भव भय हारी । मुरलीधर हरि मदन मुरारी ॥
नारायण श्रीपति पुरुषोत्तम । पद्मनाभि नरहरि सर्वोत्तम ॥3॥
जै माधव मुकुन्द वनमाली । खल दल मर्दन दमन कुचाली ॥
जै अगणित इन्द्रिय सारंगधर । विश्व रुप वामन आन्नद कर ॥4॥

जै जै लोकाध्यक्ष धनंजय । सहस्त्रज्ञ जगन्नाथ जयति जै ॥
जै मधुसूदन अनुपम आनन । जयति वायु वाहन वज्र कानन ॥5॥
जै गोविन्द जनार्दन देवा । शुभ फल लहत गहत तव सेवा ॥
श्याम सरोरुह सम तन सोहत । दर्शन करत सुर नर मुनि मोहत ॥6॥

भाल विशाल मुकुट सिर साजत । उर वैजन्ती माल विराजत ॥
तिरछी भृकुटि चाप जनु धारे । तिन तर नैन कमल अरुनारे ॥7॥
नासा चिबुक कपोल मनोहर । मृदु मुस्कान कुञ्ज अधरन पर ॥
जनु मणि पंक्ति दशन मन भावन । बसन पीत तन परम सुहावन ॥8॥

रुप चतुर्भज भूषित भूषण । वरद हस्त मोचन भव दूषण ॥
कंजारुन सम करतल सुन्दर । सुख समूह गुण मधुर समुन्दर ॥9॥
कर महँ लसित शंख अति प्यारा । सुभग शब्द जै देने हारा ॥
रवि सम चक्र द्वितीय कर धारे । खल दल दानव सैन्य संहारे ॥10॥

तृतीय हस्त महँ गदा प्रकाशन । सदा ताप त्रय पाप विनाशन ॥
पद्म चतुर्थ हाथ महँ धारे । चारि पदारथ देने हारे ॥11॥
वाहन गरुड़ मनोगतिवाना । तिहुँ त्यागत जन हित भगवाना ॥
पहुँचि तहाँ पत राखत स्वामी । हो हरि सम भक्तन अनुरागी ॥12॥

धनि धनि महिमा अगम अन्नता । धन्य भक्तवत्सल भगवन्ता ॥
जब जब सुरहिं असुर दुख दीन्हा । तब तब प्रकटि कष्ट हरि लीन्हा ॥13॥
सुर नर मुनि ब्रहमादि महेशू । सहि न सक्यो अति कठिन कलेशू ॥
तब तहँ धरि बहुरुप निरन्तर । मर्द्यो दल दानवहि भयंकर ॥14॥

शय्या शेष सिन्धु बिच साजित । संग लक्ष्मी सदा विराजित ॥
पूरन शक्ति धन्य धन खानी । आन्नद भक्ति भरणी सुख दानी ॥15॥
जासु विरद निगमागम गावत । शारद शेष पार नहीं पावत ॥
रमा राधिका सिय सुख धामा । सोही विष्णु कृष्ण अरु रामा ॥16॥

अगणित रुप अनूप अपारा । निर्गुण सगण स्वरुप तुम्हारा ॥
नहिं कछु भेद वेद अस भासत । भक्तन से नहिं अन्तर राखत ॥17॥
श्री प्रयाग दुवाँसा धामा । सुन्दरदास तिवारी ग्रामा ॥
जग हित लागि तुम्हिं जगदीशा । निज मति रच्यो विष्णु चालीसा ॥18॥

जो चित्त दै नित पढ़त पढ़ावत । पूरन भक्त्ति शक्ति सरसावत ॥
अति सुख वसत रुज ऋण नाशत । वैभव विकासत सुमति प्रकाशत ॥19॥
आवत सुख गावत श्रुति शारद । भाषन व्यास वचन ऋषि नारद ॥
मिलत सुभग फल शोक नसावत । अन्त समय जन हरि पद पावत ॥20॥

॥ दोहा ॥
प्रेम सहित गहि ध्यान महँ हृदय बीच जगदीश ।
अर्पित शालिग्राम कहँ करि तुलसी नित शीश ॥
क्षणभंगुर तनु जानि करि अहंकार परिहार ।
सार रुप ईश्वर लखै तजि असार संसार ॥

सत्य शोध करि उर गहै एक ब्रह्म ओंकार ।
आत्मबोध होवै तबै मिलै मुक्त्ति के द्वार ॥
शान्ति और सद्भाव कहँ जब उर फूलहिं फूल ।
चालिसा फल लहहिं जहँ रहहिं ईश अनुकूल ॥

एक पाठ जन नित करै विष्णु देव चालीस ।
चार पदारथ नवहुँ निधि देय द्वारिकाधीश ॥

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- विष्णु भगवान की व्रत कथा
- विष्णु भगवान की आरती
- विष्णु भगवान के 108 नाम
- विष्णु भगवान के मंत्र 

Thursday, 21 December 2017

विष्णु भगवान की व्रत कथा (Vishnu bhagwan ki vrat katha)

।। ॐ नमो भगवते् वासुदेवाय नमः ।।
हिंदू मान्यता के अनुसार विष्णु भगवान का दिन बृहस्पतिवार है। विष्णु भगवान को पीली वस्तुएं अत्यधिक प्रिय हैं। विष्णु भगवान का व्रत करने वालों को या व्रती को पीली वस्तुएं उपयोग करने चाहिए। विष्णु भगवान की पत्नी लक्ष्मी जी है। विष्णु भगवान के व्रत से विवाह में आई परेशानी दूर होती है विष्णु भगवान के व्रत से विवाह जल्दी हो जाता है।
विष्णु भगवान  ke vrat ki vidhi)
गुरुवार की पूजा विधि-विधान के अनुसार की जानी चाहिए. व्रत वाले दिन सुबह उठकर बृहस्पति देव का पूजन करना चाहिए. बृहस्पति देव का पूजन पीली वस्तुए, पीले फूल, चने की दाल, मुनक्का, पीली मिठाई, पीले चावल और हल्दी चढ़ाकर कि के पेड़ की का पूजा की जाती है. कथा और पूजन के समय मन, कर्म और वचन से शुद्ध होकर मनोकामना पूर्ति के लिए बृहस्पतिदेव से प्रार्थना करनी चाहिए.
जल में हल्दी डालकर केले के पेड़ पर चढ़ाएं. केले की जड़ में चने की दाल और मुनक्का चढ़ाएं साथ ही दीपक जलाकर पेड़ की आरती उतारें. दिन में एक समय ही भोजन करें. खाने में चने की दाल या पीली चीजें खाएं, नमक न खा‌एं, पीले वस्त्र पहनें, पीले फलों का इस्तेमाल करें. पूजन के बाद भगवान बृहस्पति की कथा सुननी चाहिए.
 विष्णु भगवान की व्रत कथा(Vishnu bhagwan ki vrat katha)
बृहस्पतिवार के दिन विष्णु जी की पूजा होती है। यह व्रत करने से बृहस्पति देवता प्रसन्न होते हैं। स्त्रियों के लिए यह व्रत फलदायी माना गया है। अग्निपुराण के अनुसार अनुराधा नक्षत्र युक्त गुरुवार से आरंभ करके सात गुरुवार व्रत करने से बृहस्पति ग्रह की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
बृहस्पतिवार व्रत कथा: प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहता था। वह जहाजों में माल लदवाकर दूसरे देशों में भेजा करता था। वह जिस प्रकार अधिक धन कमाता था उसी प्रकार जी खोलकर दान भी करता था, परंतु उसकी पत्नी अत्यंत कंजूस थी। वह किसी को एक दमड़ी भी नहीं देने देती थी। 
एक बार सेठ जब दूसरे देश व्यापार करने गया तो पीछे से बृहस्पतिदेव ने साधु-वेश में उसकी पत्नी से भिक्षा मांगी। व्यापारी की पत्नी बृहस्पतिदेव से बोली हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरा सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं। मैं यह धन लुटता हुआ नहीं देख सकती। 
बृहस्पतिदेव ने कहा, हे देवी, तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से कोई दुखी होता है। अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचों का निर्माण कराओ। ऐसे पुण्य कार्य करने से तुम्हारा लोक-परलोक सार्थक हो सकता है, परन्तु साधु की इन बातों से व्यापारी की पत्नी को ख़ुशी नहीं हुई। उसने कहा- मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं है, जिसे मैं दान दूं।
तब बृहस्पतिदेव बोले "यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तुम एक उपाय करना। सात बृहस्पतिवार घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, व्यापारी से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़े अपने घर धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए। 
व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देव के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल तीन बृहस्पतिवार बीते थे कि उसी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई और वह परलोक सिधार गई। जब व्यापारी वापस आया तो उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो चुका है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री को सांत्वना दी और दूसरे नगर में जाकर बस गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की लेकिन व्यापारी के पास दही खरीदने के पैसे नहीं थे। वह अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल में लकड़ी काटने चला गया। वहां एक वृक्ष के नीचे बैठ अपनी पूर्व दशा पर विचार कर रोने लगा। उस दिन बृहस्पतिवार था। तभी वहां बृहस्पतिदेव साधु के रूप में सेठ के पास आए और बोले "हे मनुष्य, तू इस जंगल में किस चिंता में बैठा है?"
तब व्यापारी बोला "हे महाराज, आप सब कुछ जानते हैं।" इतना कहकर व्यापारी अपनी कहानी सुनाकर रो पड़ा। बृहस्पतिदेव बोले "देखो बेटा, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ है लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो। तुम गुरुवार के दिन बृहस्पतिदेव का पाठ करो। दो पैसे के चने और गुड़ को लेकर जल के लोटे में शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद अपने परिवार के सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो। स्वयं भी प्रसाद और चरणामृत लो। भगवान तुम्हारा अवश्य कल्याण करेंगे।"
साधु की बात सुनकर व्यापारी बोला "महाराज। मुझे तो इतना भी नहीं बचता कि मैं अपनी पुत्री को दही लाकर दे सकूं।" इस पर साधु जी बोले "तुम लकड़ियां शहर में बेचने जाना, तुम्हें लकड़ियों के दाम पहले से चौगुने मिलेंगे, जिससे तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जाएंगे।"
लकड़हारे ने लकड़ियां काटीं और शहर में बेचने के लिए चल पड़ा। उसकी लकड़ियां अच्छे दाम में बिक गई जिससे उसने अपनी पुत्री के लिए दही लिया और गुरुवार की कथा हेतु चना, गुड़ लेकर कथा की और प्रसाद बांटकर स्वयं भी खाया। उसी दिन से उसकी सभी कठिनाइयां दूर होने लगीं, परंतु अगले बृहस्पतिवार को वह कथा करना भूल गया। 
अगले दिन वहां के राजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन कर पूरे नगर के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया। राजा की आज्ञा अनुसार पूरा नगर राजा के महल में भोज करने गया। लेकिन व्यापारी व उसकी पुत्री तनिक विलंब से पहुंचे, अत: उन दोनों को राजा ने महल में ले जाकर भोजन कराया। जब वे दोनों लौटकर आए तब रानी ने देखा कि उसका खूंटी पर टंगा हार गायब है। रानी को व्यापारी और उसकी पुत्री पर संदेह हुआ कि उसका हार उन दोनों ने ही चुराया है। राजा की आज्ञा से उन दोनों को कारावास की कोठरी में कैद कर दिया गया। कैद में पड़कर दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देव ने प्रकट होकर व्यापारी को उसकी भूल का आभास कराया और उन्हें सलाह दी कि गुरुवार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हें दो पैसे मिलेंगे उनसे तुम चने और मुनक्का मंगवाकर विधिपूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना। तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएंगे। 
बृहस्पतिवार को कैदखाने के द्वार पर उन्हें दो पैसे मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकार गुड़ और चने लाने को कहा। इसपर वह स्त्री बोली "मैं अपनी बहू के लिए गहने लेने जा रही हूं, मेरे पास समय नहीं है।" इतना कहकर वह चली गई। थोड़ी देर बाद वहां से एक और स्त्री निकली, व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि हे बहन मुझे बृहस्पतिवार की कथा करनी है। तुम मुझे दो पैसे का गुड़-चना ला दो। 
बृहस्पतिदेव का नाम सुनकर वह स्त्री बोली "भाई, मैं तुम्हें अभी गुड़-चना लाकर देती हूं। मेरा इकलौता पुत्र मर गया है, मैं उसके लिए कफन लेने जा रही थी लेकिन मैं पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद अपने पुत्र के लिए कफन लाऊंगी।"
वह स्त्री बाजार से व्यापारी के लिए गुड़-चना ले आई और स्वयं भी बृहस्पतिदेव की कथा सुनी। कथा के समाप्त होने पर वह स्त्री कफन लेकर अपने घर गई। घर पर लोग उसके पुत्र की लाश को "राम नाम सत्य है" कहते हुए श्मशान ले जाने की तैयारी कर रहे थे। स्त्री बोली "मुझे अपने लड़के का मुख देख लेने दो।" अपने पुत्र का मुख देखकर उस स्त्री ने उसके मुंह में प्रसाद और चरणामृत डाला। प्रसाद और चरणामृत के प्रभाव से वह पुन: जीवित हो गया। 
पहली स्त्री जिसने बृहस्पतिदेव का निरादर किया था, वह जब अपने पुत्र के विवाह हेतु पुत्रवधू के लिए गहने लेकर लौटी और जैसे ही उसका पुत्र घोड़ी पर बैठकर निकला वैसे ही घोड़ी ने ऐसी उछाल मारी कि वह घोड़ी से गिरकर मर गया। यह देख स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देव से क्षमा याचना करने लगी। 
उस स्त्री की याचना से बृहस्पतिदेव साधु वेश में वहां पहुंचकर कहने लगे "देवी। तुम्हें अधिक विलाप करने की आवश्यकता नहीं है। यह बृहस्पतिदेव का अनादार करने के कारण हुआ है। तुम वापस जाकर मेरे भक्त से क्षमा मांगकर कथा सुनो, तब ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।"
जेल में जाकर उस स्त्री ने व्यापारी से माफी मांगी और कथा सुनी। कथा के उपरांत वह प्रसाद और चरणामृत लेकर अपने घर वापस गई। घर आकर उसने चरणामृत अपने मृत पुत्र के मुख में डाला| चरणामृत के प्रभाव से उसका पुत्र भी जीवित हो उठा। उसी रात बृहस्पतिदेव राजा के सपने में आए और बोले "हे राजन। तूने जिस व्यापारी और उसके पुत्री को जेल में कैद कर रखा है वह बिलकुल निर्दोष हैं। तुम्हारी रानी का हार वहीं खूंटी पर टंगा है।"
दिन निकला तो राजा रानी ने हार खूंटी पर लटका हुआ देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को रिहा कर दिया और उन्हें आधा राज्य देकर उसकी पुत्री का विवाह उच्च कुल में करवाकर दहेज़ में हीरे-जवाहरात दिए।


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- विष्णु भगवान के 108 नाम
- विष्णु भगवान की आरती
- विष्णु भगवान की चालीसा
- विष्णु भगवान के मंत्र 

विष्णुजी के 108 नाम (108 Names of Lord Vishnu ji)

Vishnu bhagwan
।। ॐ नमो भगवते् वासुदेवाय नमः ।।
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार हरि विष्णु को हिन्दू धर्म के त्रिदेवों में से एक माना जाता है। मान्यता के अनुसार  विष्णु भगवान का दिन  वीरवार है विष्णु भगवान को पीला रंग अत्यधिक प्रिय है कहा जाता है की केले के वृक्ष में विष्णु भगवान का वास होता है। मान्यता के अनुसार जगत का पालन श्री हरि विष्णु जी ही करते हैं। विष्णु जी देवी लक्ष्मी (विष्णुजी की पत्नी) के साथ क्षीरसागर में वास करते हैं। हिन्दू धर्म- शास्त्रों में भगवान विष्णु को श्री हरि, नारायण, नर-नारायण आदि कई नामों से जाना जाता है। विष्णुजी के कुछ विशेष 108 नाम निम्न हैं:
विष्णुजी के 108 नाम (108 Names of Lord Vishnu ji) 
1. नारायण : ईश्वर, परमात्मा
2. विष्णु : हर जगह विराजमान रहने वाले
3. वषट्कार: यज्ञ से प्रसन्न होने वाले
4. भूतभव्यभवत्प्रभु: भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी
5. भूतकृत : सभी प्राणियों के रचयिता
6. भूतभृत : सभी प्राणियों का पोषण करने वाले
7. भाव : सम्पूर्ण अस्तित्व वाले
8. भूतात्मा : ब्रह्मांड के सभी प्राणियों की आत्मा में वास करने वाले
9. भूतभावन : ब्रह्मांड के सभी प्राणियों का पोषण करने वाले
10. पूतात्मा : शुद्ध छवि वाले प्रभु
11. परमात्मा : श्रेष्ठ आत्मा
12. मुक्तानां परमागति: मोक्ष प्रदान करने वाले
13. अव्यय: : हमेशा एक रहने वाले
14. पुरुष: : हर जन में वास करने वाले
15. साक्षी : ब्रह्मांड की सभी घटनाओं के साक्षी
16. क्षेत्रज्ञ: : क्षेत्र के ज्ञाता
17. गरुड़ध्वज: गरुड़ पर सवार होने वाले
18. योग: : श्रेष्ठ योगी
19. योगाविदां नेता : सभी योगियों का स्वामी
20. प्रधानपुरुषेश्वर : प्रकृति और प्राणियों के भगवान
21. नारसिंहवपुष: : नरसिंह रूप धरण करने वाले
22. श्रीमान् : देवी लक्ष्मी के साथ रहने वाले
23. केशव : सुंदर बाल वाले
24. पुरुषोत्तम : श्रेष्ठ पुरुष
25. सर्व : संपूर्ण या जिसमें सब चीजें समाहित हों
26. शर्व : बाढ़ में सब कुछ नाश करने वाले
27. शिव : सदैव शुद्ध रहने वाले
28. स्थाणु : स्थिर रहने वाले
29. भूतादि : सभी को जीवन देने वाले
30. निधिरव्यय : अमूल्य धन के समान
31. सम्भव : सभी घटनाओं में स्वामी
32. भावन : भक्तों को सब कुछ देने वाले
33. भर्ता : सम्पूर्ण ब्रह्मांड के संचालक
34. प्रभव : सभी चीजों में उपस्थित होने वाले
35. प्रभु : सर्वशक्तिमान प्रभु
36. ईश्वर : पूरे ब्रह्मांड पर अधिपति
37. स्वयम्भू : स्वयं प्रकट होने वाले
38. शम्भु : खुशियां देने वाले
39. आदित्य : देवी अदिति के पुत्र
40. पुष्कराक्ष : कमल जैसे नयन वाले
41. महास्वण : वज्र की तरह स्वर वाले
42. अनादिनिधन : जिनका न आदि है एयर न अंत
43. धाता : सभी का समर्थन करने वाले
44. विधाता : सभी कार्यों व परिणामों की रचना करने वाले
45. धातुरुत्तम : ब्रह्मा से भी महान
46. अप्रेमय : नियम व परिभाषाओं से परे
47. हृषीकेशा : सभी इंद्रियों के स्वामी
48. पद्मनाभ : जिनके पेट से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई
49. अमरप्रभु : अमर रहने वाले
50. विश्वकर्मा : ब्रह्मांड के रचयिता
51. मनु : सभी विचार के दाता
52. त्वष्टा : बड़े को छोटा करने वाले
53. स्थविष्ठ : मुख्य
54. स्थविरो ध्रुव : प्राचीन देवता
55. अग्राह्य : मांसाहार का त्याग करने वाले
56. शाश्वत : हमेशा अवशेष छोड़ने वाले
57. कृष्ण : काले रंग वाले
58. लोहिताक्ष : लाल आँखों वाले
59. प्रतर्दन : बाढ़ के विनाशक
60. प्रभूत : धन और ज्ञान के दाता
61. त्रिककुब्धाम : सभी दिशाओं के भगवान
62. पवित्रां : हृदया पवित्र करने वाले
63. मंगलपरम् : श्रेष्ठ कल्याणकारी
64. ईशान : हर जगह वास करने वाले
65. प्राणद : प्राण देने वाले
66. प्राण : जीवन के स्वामी
67. ज्येष्ठ : सबसे बड़े प्रभु
68. श्रेष्ठ : सबसे महान
69. प्रजापति : सभी के मुख्य
70. हिरण्यगर्भ : विश्व के गर्भ में वास करने वाले
71. भूगर्भ : खुद के भीतर पृथ्वी का वहन करने वाले
72. माधव : देवी लक्ष्मी के पति
73. मधुसूदन : रक्षक मधु के विनाशक
74. ईश्वर : सबको नियंत्रित करने वाले
75. विक्रमी : सबसे साहसी भगवान
76. धन्वी : श्रेष्ठ धनुष- धारी
77. मेधावी : सर्वज्ञाता
78. विक्रम : ब्रह्मांड को मापने वाले
79. क्रम : हर जगह वास करने वाले
80. अनुत्तम : श्रेष्ठ ईश्वर
81. दुराधर्ष : सफलतापूर्वक हमला न करने वाले
82. कृतज्ञ : अच्छाई- बुराई का ज्ञान देने वाले
83. कृति : कर्मों का फल देने वाले
84. आत्मवान : सभी मनुष्य में वास करने वाले
85. सुरेश : देवों के देव
86. शरणम : शरण देने वाले
87. शर्म :
88. विश्वरेता : ब्रह्मांड के रचयिता
89. प्रजाभव : भक्तों के अस्तित्व के लिए अवतार लेने वाले
90. अह्र : दिन की तरह चमकने वाले
91. सम्वत्सर : अवतार लेने वाले
92. व्याल : नाग द्वारा कभी न पकड़े जाने वाले
93. प्रत्यय : ज्ञान का अवतार कहे जाने वाले
94. सर्वदर्शन : सब कुछ देखने वाले
95. अज : जिनका जन्म नहीं हुआ
96. सर्वेश्वर : सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी
97. सिद्ध : सब कुछ करने वाले
98. सिद्धि : कार्यों के प्रभाव देने वाले
99. सर्वादि : सभी क्रियाओं के प्राथमिक कारण
100. अच्युत : कभी न चूकने वाले
101. वृषाकपि: धर्म और वराह का अवतार लेने वाले
102. अमेयात्मा: जिनका कोई आकार नहीं है।
103. सर्वयोगविनि:  सभी योगियों के स्वामी
104. वसु : सभी प्राणियों में रहने वाले
105. वसुमना: सौम्य हृदय वाले
106. सत्य : सत्य का समर्थन करने वाले
107. समात्मा: सभी के लिए एक जैसे
108. सममित: सभी प्राणियों में असीमित रहने वाले

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Wednesday, 20 December 2017

विष्णु भगवान की आरती (Vishnu bhagwan ki aarti)

Vishnu bhagwan
।। ॐ नमो भगवते् वासुदेवाय नमः ।।

हिंदू मान्यता के अनुसार वार में वीरवार विष्णु भगवान का दिन है। मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि वीरवार के दिन केले के वृक्ष की पूजा होती है यह भी कहा जाता है की विष्णु भगवान को पीले रंग की वस्तुएं अत्यधिक प्रिय होती हैं।मान्यता के अनुसार यह भी कहां जाता है की विष्णु भगवान का वास  केले के वृक्ष में होता है विष्णु भगवान के व्रत के अनुसार व्रत कथा के बाद विष्णु भगवान की आरती का पढ़ना उचित माना जाता है।

विष्णु भगवान की आरती

ऊँ जय जगदीश हरे, प्रभु जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे।।
ऊँ जय जगदीश हरे।


जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मनका।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तनका।।
ऊँ जय जगदीश हरे।


मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी।।
ऊँ जय जगदीश हरे।


तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी।।
ऊँ जय जगदीश हरे।


तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता।।
ऊँ जय जगदीश हरे।


तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलू दयामय, तुमको मैं कुमति ।।
ऊँ जय जगदीश हरे।


दीनबन्धु, दुखहर्ता ठाकुर तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे।।
ऊँ जय जगदीश हरे।


विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा।।
ऊँ जय जगदीश हरे।


ऊँ जय जगदीश हरे, प्रभु जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे।।